कार्तिक मास की शुक्‍ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से छठ पर्व की शुरुआत हो जाती है. चार दिन के इस त्‍योहार मे नहाय-खाय से शुरू इस पर्व के दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन डूबते सूरज को अर्घ्‍य और चौथे दिन उगते सूरज को अर्घ्‍य दिया जाता है. इसी के साथ इस पर्व का समापन होता है. छठ के इस पर्व की बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्‍तर प्रदेश में बहुत मान्‍यता है. छठ के पर्व की शुरुआत को लेकर कई तरह की मान्‍यताएं प्रचलित हैं. कुछ लोग इसकी शुरुआत त्रेतायुग, तो कुछ लोग द्वापरयुग से मानते हैं. आइए आपको बताते हैं इन मान्‍यताओं के बारे में.

त्रेतायुग में माता सीता ने रखा था ये व्रत

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छठ पूजा की परंपरा को लेकर कहा जाता है कि जब राम और सीता 14 वर्ष के वनवास से वापस अयोध्‍या लौटे थे, तब रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए उन्होंने ऋषि-मुनियों की सलाह पर राजसूर्य यज्ञ का आयोजन किया. इस यज्ञ में पूजा के लिए श्रीराम ने मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया. मुग्दल ऋषि ने माता सीता पर गंगाजल छिड़का और उन्‍हें पवित्र किया और तब माता सीता को कार्तिक मास की शुक्‍ल पक्ष की षष्ठी तिथि के दिन सूर्यदेव की पूजा करने का आदेश दिया. इसके बाद सीता मैया ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों सूर्य भगवान की पूजा की थी. 

द्रौपदी ने भी रखा था व्रत

कुछ लोग छठ पर्व की शुरुआत द्वापरयुग से मानते हैं.  महाभारत काल के समय जब पांडव चौपड़ में अपना सारा राजपाट हार गए थे, तब द्रौपदी ने छठ का व्रत रखकर छठी मइया और सूर्य देव की उपासना की थी. इस व्रत के प्रभाव से उनकी मनोकामना पूरी हुई और पांडवों को अपना खोया राजपाट वापस मिल गया था. कहा जाता है कि महाभारत काल में जब अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में में पल रहे बच्चे का वध कर दिया था, तब भगवान श्रीकृष्‍ण ने उत्‍तरा को छठी माता का व्रत रखने की सलाह दी थी. माना जाता है कि छठी मइया और सूर्य देव भाई बहन हैं. इसलिए इस व्रत में छठी मइया के साथ उनके भाई सूर्य की पूजा का भी विशेष महत्‍व है. 

पानी में खड़े होकर अर्घ्‍य देने की परंपरा

छठ पर्व में व्रत के दौरान सूर्य देव को पानी के अंदर खड़े होकर अर्घ्‍य दिया जाता है. इसको लेकर मान्‍यता है कि पानी के अंदर सूर्य देव को अर्घ्‍य देने की शुरुआत द्वापरयुग में हुई थी. कर्ण सूर्य पुत्र होने के साथ सूर्य देव के बहुत बड़े भक्‍त भी थे. वे पानी के अंदर कमर तक खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्‍य दिया करते थे. सूर्यदेव की उन पर विशेष कृपा थी और उसी कृपा से उन्‍हें कवच व कुंडल मिले थे और कर्ण महाबली और प्रतापी बने थे. तब से पानी के अंदर खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्‍य देने की परंपरा शुरु हुई.